अकबर-बीरबल की चतुराई 4 मिनट का पठन 6 बार पढ़ा गया

बीरबल की खिचड़ी (Birbal Ki Khichdi)

अकबर-बीरबल साहित्यिक कृति
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बीरबल की खिचड़ी (Birbal Ki Khichdi)
सर्दियों का मौसम था। दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। यमुना नदी का पानी बर्फ की तरह ठंडा था।

एक दिन बादशाह अकबर और उनके चहेते नवरत्न बीरबल महल के बगीचे में टहल रहे थे। अकबर ने मजाक में कहा—'बीरबल! क्या कोई मनुष्य केवल थोड़े से धन के लालच में इस जमा देने वाली ठंडी रात में यमुना के बर्फीले पानी में रात भर खड़ा रह सकता है?'

बीरबल ने उत्तर दिया—'जहाँपनाह! पेट की भूख और परिवार की मजबूरी मनुष्य से असंभव काम भी करा लेती है।'

अकबर ने घोषणा करवा दी कि जो व्यक्ति पूरी रात यमुना के बर्फीले पानी में गले तक डूबकर बिताएगा, उसे एक हजार सोने की मुहरें इनाम में दी जाएँगी।

एक अत्यंत निर्धन धोबी ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। उसने रात भर हाड़ कंपाने वाली ठंड में यमुना के सीने पर खड़े होकर रात बिताई। सुबह जब वह काँपता हुआ राजदरबार में पहुँचा, तो अकबर ने आश्चर्य से पूछा—'तुमने इतनी विकट ठंड में पूरी रात कैसे काटी?'

धोबी ने सरलता से कहा—'हुजूर! रात भर मैं दूर राजमहल की छत पर जल रहे एक छोटे से दीपक को देखता रहा और उसी की आस में रात कट गई।'

अकबर ने चालाकी दिखाते हुए कहा—'ओह! तो तुमने राजमहल के दीपक की गर्मी लेकर ठंड का मुकाबला किया। यह तो छल है। तुम्हें कोई इनाम नहीं मिलेगा।'

गरीब धोबी रोता हुआ दरबार से चला गया। बीरबल को बादशाह का यह अन्याय सहन न हुआ।

अगले दिन बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं हुए। जब दोपहर तक भी वे नहीं आए, तो बादशाह अकबर स्वयं उनके घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि बीरबल ने ज़मीन पर आग जलाई हुई है और उससे लगभग दस फीट ऊँचे बाँस के खंभे पर एक हाँडी लटकाई हुई है।

बादशाह ने चकित होकर पूछा—'बीरबल, यह क्या तमाशा है? इतनी दूरी पर आग जलाकर तुम क्या कर रहे हो?'
बीरबल ने शांत भाव से कहा—'जहाँपनाह! मैं दोपहर के भोजन के लिए खिचड़ी पका रहा हूँ।'

अकबर हँस पड़े और बोले—'बीरबल, क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? इतनी दूर जल रही आग की गरमी क्या दस फीट ऊपर लटकी हाँडी तक पहुँच सकती है? यह खिचड़ी कभी नहीं पकेगी।'

बीरबल ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा—'जहाँपनाह! जब दो मील दूर राजमहल की छत पर जल रहे एक छोटे से दीये की गरमी से यमुना के बर्फीले पानी में खड़े धोबी को गर्मी मिल सकती है, तो दस फीट की दूरी से मेरी खिचड़ी क्यों नहीं पक सकती?'

बादशाह अकबर को तुरंत अपनी भूल और अन्याय का बोध हुआ। वे लज्जित हो गए। उन्होंने तत्काल गरीब धोबी को दरबार में बुलवाया और उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राओं के साथ अतिरिक्त उपहार देकर सम्मानित किया।
कहानी की सीख (Moral of the Story)

किसी की मेहनत और लगन का उपहास नहीं उड़ाना चाहिए। न्याय वही है जो मानवीय संवेदनाओं की परख करे।

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