प्रस्तावना: यादों का झरोखा
आज जब मैं ६५ वर्ष की आयु में अपने घर के बरामदे में बैठता हूँ, तो सामने लहलहाते खेत मुझे मेरी जड़ों की याद दिलाते हैं। यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है, यह उस मिट्टी की है जिसने मुझे गढ़ा, उस माँ की है जिसने अभावों में भी ममता की चादर तानी और उस पिता की है जिन्होंने हल की लकीरों से हमारे भाग्य की रेखाएं लिखीं। १०,००० शब्दों का यह सफर मेरे पसीने, आंसुओं और अटूट स्वाभिमान की गवाही है।
१. १९६३: एक साधारण शुरुआत
साल १९६३। देश बदल रहा था, लेकिन मेरा गाँव आज भी सदियों पुरानी सादगी में लिपटा था। उस साल एक छोटे से, कच्चे मकान में मेरा जन्म हुआ। मैं अपने माता-पिता की तीसरी संतान था और सबसे छोटा होने के नाते सबकी आँखों का तारा भी। मेरा घर मिट्टी का था, जिसकी दीवारें वक्त के थपेड़ों से कमजोर हो चुकी थीं। छतों पर खपरैल (टाइलें) थीं, जो भारी बारिश में अक्सर हार मान जाती थीं। मुझे याद है, जब सावन की झड़ी लगती, तो घर के अंदर बर्तनों की कतार लग जाती थी ताकि टपकती बूंदों से फर्श न भीगे। उस ‘टप-टप’ की आवाज में एक अजीब सा डर और संगीत दोनों थे।
मेरे पिता एक कर्मठ किसान थे। उम्र में वे मेरी माता से बड़े थे। वे अनपढ़ थे, लेकिन उनके पास जीवन का वो अनुभव था जो किसी किताब में नहीं मिलता। सुबह चार बजे जब सारा गाँव सोता था, मेरे पिता बैलों को लेकर खेतों की ओर निकल जाते थे। उनकी पूरी दुनिया हल, बैल और मिट्टी के इर्द-गिर्द सिमटी थी। मेरी माँ, जो उम्र में छोटी थीं, घर के अंतहीन कामों में खुद को झोंक देती थीं। पांच परिवारों का एक ही साझा आंगन था, जहाँ खुशियाँ कम और शोर ज्यादा था।
२. माँ की कमीज और स्कूल का वो पहला दिन
गरीबी क्या होती है, यह हमने किताबों से नहीं, भूख और तन की नग्नता से सीखा। एक वाकया मेरे जेहन में पत्थर की लकीर की तरह खुदा है। स्कूल में दाखिला हो चुका था, लेकिन मेरे पास पहनने के लिए एक साबुत कमीज तक नहीं थी। पिता के पास पैसे नहीं थे और भाइयों के कपड़े मुझे बहुत बड़े होते थे। उस दिन माँ ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने अपनी एक पुरानी कमीज निकाली और मुझे पहना दी।
मैं छोटा था, भोला था। मुझे लगा कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर बालक हूँ। लेकिन जैसे ही स्कूल की दहलीज पर कदम रखा, हंसी के फव्वारे छूट पड़े। कोई कहता, “देखो, माँ का लाडला अपनी माँ के ही कपड़े पहन आया है।” बच्चों की उन बातों ने मेरे बाल-मन को बहुत चोट पहुँचाई, लेकिन आज समझ आता है कि उस कमीज में माँ की ममता का वो कवच था जिसने मुझे दुनिया की ठंडक से बचाए रखा।
३. दीपावली का वो ‘तेल वाला चूरमा’
त्योहारों का मतलब आज के बच्चों के लिए नए कपड़े और पटाखे हैं, लेकिन हमारे लिए त्योहार का मतलब था ‘पेट भरकर रोटी’। एक दीपावली की रात, पूरे गाँव में दियों की रोशनी थी और पकवानों की खुशबू। लेकिन हमारे घर में घी का एक डिब्बा तक खाली पड़ा था। माँ की आँखों में नमी थी, पर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने सूखी रोटियों को अपने हाथों से चूरा, उसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाया और बिना घी के ही ‘चूरमा’ तैयार कर दिया।
हम भाई चूल्हे के पास बैठे थे। माँ गरम-गरम रोटियाँ तोड़कर हमें खिला रही थी। मेरे बड़े भाई, जो हमेशा से घर की इज्जत को लेकर बहुत सजग थे, उन्होंने एक अद्भुत काम किया। बाहर निकलते समय उन्होंने अपने हाथों पर ‘बालों वाला तेल’ लिया और अपने होठों और गालों पर मल लिया। जब पड़ोसियों ने पूछा, “क्या खाया?” तो भाई ने चमकते चेहरे के साथ कहा, “खूब घी वाला चूरमा खाकर आए हैं।” वह तेल की चमक नहीं थी, वह हमारे परिवार के स्वाभिमान की चमक थी। हमने दुनिया को यह अहसास नहीं होने दिया कि हम भीतर से कितने खाली हैं।
४. गेहूँ की रोटी और मेहमानों का सत्कार
उन दिनों गेहूँ की रोटी हमारे लिए किसी राजसी भोजन से कम नहीं थी। हम ज्यादातर मोटे अनाज (बाजरा या मक्का) ही खाते थे। एक बार घर में कुछ रिश्तेदार आए। माँ ने बड़े जतन से गेहूँ की रोटियां बनाईं। मैं छोटा था और भूख से व्याकुल था। मैं रोने लगा कि मुझे भी वही रोटी चाहिए। माँ ने मर्यादा का वास्ता देकर मुझे डांटा और बाहर भेज दिया। भाइयों ने समझाया, “बेटा, पहले मेहमान खाएंगे, फिर जो बचेगा वो हमारा।”
बचपन की भूख तर्क नहीं समझती। मैं रोता रहा। शायद मेहमानों ने मेरी आवाज सुन ली थी। उन्होंने जानबूझकर रोटियां छोड़ दीं। जब मेहमान गए, तब हमें वो बची हुई रोटियां मिलीं। आज जब मैं फाइव स्टार होटलों के खाने देखता हूँ, तो मुझे उस बासी और बची हुई गेहूँ की रोटी का स्वाद याद आता है, जो किसी अमृत से कम नहीं था।
5. 1947 का साया और जमीन का हाथ से निकलना
बचपन की उन शरारतों और अभावों के बीच वक्त अपनी रफ्तार से बढ़ रहा था। भारत आजाद हो चुका था, लेकिन 1947 के उस ‘हुल्लड़’ (विभाजन) की गूँज हमारे गाँव तक भी पहुँची थी। उस दौरान कई मुस्लिम परिवार सरहद पार चले गए थे और उनकी पीछे छूटी जमीनें बंजर पड़ी थीं। मेरे पिता और भाइयों ने उन कटीली झाड़ियों वाली जमीनों को अपने पसीने से सींचना शुरू किया। दिन-रात एक करके उन्होंने उस बंजर धरती को उपजाऊ बनाया ताकि परिवार के दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस साल सरकार ने ‘फरमान’ जारी किया कि जो जमीन जोत रहा है, वह उसी के नाम होगी, ठीक उसी साल मेरे पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। घर में कोई और बड़ा नहीं था जो उस वक्त कागजी कार्रवाई पूरी कर पाता। नतीजा यह हुआ कि हमारी सालों की मेहनत और वो कीमती जमीन हमारे हाथ से निकलकर किसी और के नाम हो गई। यह हमारे परिवार के लिए एक बहुत बड़ा आर्थिक और मानसिक झटका था। पिता की बीमारी और जमीन का जाना, मानो पहाड़ टूट पड़ा हो।
6. भाइयों का त्याग: हापुड़ की गलियां और सेना की वर्दी
जब घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी, तो मेरे बड़े भाइयों ने अपनी इच्छाओं की बलि देना शुरू किया। मेरे सबसे बड़े भाई, जो स्वभाव से अत्यंत सरल और ईमानदार थे, वे काम की तलाश में हापुड़ (UP) चले गए। वहाँ उन्होंने एक छोटी सी दुकान पर काम करना शुरू किया। उनकी ईमानदारी की चर्चा आज भी हमारे परिवार में होती है; वे अक्सर भूखे रह लेते थे, लेकिन कभी किसी के एक पैसे का हेर-फेर नहीं किया। उन्होंने अपनी पूरी कमाई घर भेज दी ताकि हम छोटे भाई पढ़ सकें।
मेरे बीच वाले भाई के मन में देश सेवा का जज्बा था। वे सेना में जाना चाहते थे। लेकिन उस दौर में भर्ती होने के लिए भी थोड़े-बहुत पैसों की जरूरत पड़ती थी। मुझे याद है, बड़े भाई ने अपनी मेहनत की कमाई से जैसे-तैसे 2 रुपये बचाए थे, जो उस समय एक बड़ी रकम थी। उन्हीं 2 रुपयों के सहारे बीच वाले भाई सेना में भर्ती होने के लिए घर से निकले और सफल हुए। भाइयों के इस तालमेल ने हमें एक डूबती नैया से बाहर निकाला।
7. संयुक्त परिवार की दरारें और ‘वो फ्रॉक’ का किस्सा
वक्त के साथ हम बड़े हुए। बड़े भाई की शादी हुई, फिर बीच वाले भाई की। हमारा परिवार अब बड़ा हो चुका था और एक ही आँगन में खुशियों के साथ-साथ ‘मतभेद’ भी पनपने लगे थे। मेरे दोनों भाई सरकारी नौकरी में थे, जबकि मैं पढ़ाई में लापरवाह होने के कारण फेल हो गया था। मैंने खुद को पूरी तरह खेती और घर के कामों में झोंक दिया। मैं दिन भर हल चलाता, ऊंट गाड़ी संभालता और घर की हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी करता।
लेकिन विडंबना यह थी कि घर में सबसे ज्यादा मेहनत करने के बावजूद, मुझे और मेरी पत्नी को ‘आश्रित’ (Dependent) समझा जाता था। मेरी भाभियां (जो आपस में सगी बहनें थीं) अक्सर मेरी पत्नी को ताने देती थीं। मेरी पत्नी स्वभाव से बहुत शांत थी, वह सब सह लेती थी, लेकिन मेरे मन में एक आग सुलग रही थी।
उस आग ने तब विकराल रूप लिया जब एक दिन मैं अपनी नन्हीं बेटी के लिए बाज़ार से एक सुंदर फ्रॉक खरीद कर लाया। मैं चाहता था कि मेरी बेटी भी त्योहार पर अच्छी दिखे। लेकिन घर में उस फ्रॉक को देखकर ऐसा क्लेश हुआ, मानो मैंने कोई अपराध कर दिया हो। मुझ पर फिजूलखर्ची के आरोप लगे। उन तानों और लड़ाइयों से तंग आकर, मुझे अपनी रोती हुई बच्ची के हाथों से वो फ्रॉक छीनकर दुकानदार को वापस करनी पड़ी। एक पिता की बेबसी उस दिन आंसुओं के रूप में नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प के रूप में बाहर निकली।
8. कुएं की झोपड़ी: स्वाभिमान का नया घर
रिश्तों की वो कड़वाहट अब असहनीय हो चुकी थी। जब मेरे बड़े भाई का चयन LDC के पद पर हुआ, तो घर में खुशहाली तो आई, लेकिन भेदभाव और बढ़ गया। अंततः, मैंने एक कठोर निर्णय लिया। बंटवारे के समय मेरे पास न तो भाइयों जैसी सरकारी नौकरी थी और न ही कोई निश्चित आय। मेरे हिस्से में सिर्फ वो खेत आए।
मैंने अपनी पत्नी और अपने 3 छोटे बच्चों का हाथ पकड़ा और उस पक्के मकान को छोड़ दिया। हमारे पास रहने के लिए कोई छत नहीं थी, तो हमने अपने कुएं पर एक कच्ची झोपड़ी बनाई। लोग कहते थे कि “ये पागलपन है, झोपड़ी में बच्चे कैसे पलेंगे?” लेकिन मेरी पत्नी ने मेरा साथ दिया। हमने उस झोपड़ी को ही अपना स्वर्ग माना। मैंने बच्चों के पालन-पोषण के लिए एक ऊंट खरीदा। दिन भर मैं ऊंट-गाड़ी चलाकर मेहनत करता और शाम को जब घर लौटता, तो उस कच्ची झोपड़ी में मिलने वाली शांति किसी महल से कहीं ज्यादा थी।
9. कुएं की झोपड़ी: स्वाभिमान का नया स्कूल
जब हमने उस पक्के मकान को छोड़ा और कुएं पर बनी कच्ची झोपड़ी में कदम रखा, तो दुनिया की नजर में हम ‘कंगाल’ थे। लेकिन मेरे और मेरी पत्नी के मन में एक ही संकल्प था—”हमें अपने बच्चों को वो अभाव नहीं देखने देने, जो हमने देखे हैं।” बंटवारे के समय मेरे भाइयों के पास सरकारी नौकरियां थीं, पेंशन की सुरक्षा थी और महीने की बंधी-बंधाई आय थी। मेरे पास सिर्फ वो ऊबड़-खाबड़ खेत थे और मेरा अपना पसीना।
मैंने अपनी मेहनत का दायरा बढ़ाया। मैंने एक ऊंट (Camel) खरीदा और उसे अपनी आजीविका का जरिया बनाया। दिन भर मैं ऊंट-गाड़ी लेकर तपती धूप में मिट्टी और सामान ढोता। धूल और पसीने से लथपथ होकर जब मैं शाम को झोपड़ी लौटता, तो मेरी पत्नी खेतों में काम करके और बच्चों को संभालकर मेरा इंतजार करती। हम दोनों ने मिलकर तय किया कि भले ही हम रूखी रोटी खाएं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे।
10. बच्चों की उड़ान: एक किसान का गौरव
वक्त बीतता गया और मेरी मेहनत रंग लाने लगी। हमारे बच्चे पढ़ाई में तेज थे। बड़े भाई का आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमेशा साथ रहा, उन्होंने समय-समय पर बच्चों को प्रोत्साहित किया। अभावों के बीच पल रहे मेरे एक बेटे ने मेडिकल (MBBS) में जगह बनाई और दूसरे ने इंजीनियरिंग की कठिन पढ़ाई पूरी की।
एक दौर वो था जब मेरे पास स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं होते थे, और एक दौर ये आया जब मेरे बच्चे बड़े-बड़े कॉलेजों में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहे थे। आज वे दोनों प्राइवेट सेक्टर में बहुत अच्छी पोस्ट पर काम कर रहे हैं। मेरी बेटी की शादी मैंने अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ की। बड़े बेटे की पत्नी को सरकारी नौकरी मिली, जिससे परिवार की साख और बढ़ी। आज मेरे बच्चे अपने-अपने शहरों में अपने परिवारों के साथ सेटल हैं। जो बच्चा कभी फटी कमीज में घूमता था, आज उसका पिता गर्व से कह सकता है कि उसने समाज को दो हीरा जैसे बेटे दिए हैं।
11. रिश्तों का चक्र: पुरानी यादें और नए विवाद
जीवन एक अजीब पहिया है। आज मैं 65 वर्ष का हूँ। मेरे साथ मेरी वृद्ध माँ हैं और मेरी वो जीवनसंगिनी है जिसने झोपड़ी के उन अंधेरे दिनों में मेरा दीया जलाए रखा। लेकिन आज जब मैं अपने भाइयों के परिवारों को देखता हूँ, तो मन उदास हो जाता है। जिन भाभियों (सगी बहनों) की कभी बहुत पटरी बैठती थी, आज उनके बीच गहरी खाइयां खिंच गई हैं। बच्चों की शादियों के बाद उनके आपसी रिश्तों में वो मिठास नहीं रही।
दुख तब और बढ़ जाता है जब मैं देखता हूँ कि मेरे अपने बच्चों के बीच भी अब उन्हीं बातों को लेकर अनबन होने लगी है, जिन्होंने कभी हमारे संयुक्त परिवार को तोड़ा था। जमीन, जायदाद और पैसों की वही पुरानी बहसें अब नई पीढ़ी के बीच फिर से जन्म ले रही हैं। 70 के इस पड़ाव पर आकर जब भाइयों के बीच मतभेद बढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है मानो हमने इतनी लंबी लड़ाई लड़कर जो शांति कमाई थी, वह फिर से खतरे में है।
12. क्या जीवन यही है? (निष्कर्ष)
आज भी मैं उन्हीं खेतों में हल चलाता हूँ। कभी बच्चे त्यौहारों पर घर आते हैं, खुशियाँ मनाते हैं, और कभी अपनी व्यस्तताओं में हमें भूल जाते हैं। कभी वो हाथ बढ़ाकर मेरी मदद करते हैं, तो कभी मैं खुद को अकेला पाता हूँ। लेकिन अब कोई शिकायत नहीं है।
मैंने अपनी माँ की वो फटी कमीज देखी है, मैंने बिना घी का वो सूखा चूरमा चखा है, और मैंने अपनी बच्ची की फ्रॉक को वापस होते हुए भी देखा है। उन सब अनुभवों ने मुझे आज इस मुकाम पर खड़ा किया है कि मैं सिर उठाकर जी सकूँ। जीवन शायद यही है—एक निरंतर संघर्ष, जहाँ हम अपनों के लिए लड़ते हैं और अंत में अपनों के ही बीच खुद को अकेला पाते हैं। जब तक ये साँसें चल रही हैं, मेरा स्वाभिमान मेरी सबसे बड़ी पूँजी है।