भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 6: आपराधिक न्यायालयों के वर्ग (Classes of Criminal Courts)

1. प्रस्तावना (Introduction)

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली (Indian Criminal Justice System) अपने इतिहास के सबसे बड़े परिवर्तनकारी दौर से गुजर रही है। वर्ष 1898 और उसके बाद वर्ष 1973 की दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) को प्रतिस्थापित करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) को लागू किया गया है। यह नया कानून न केवल आधुनिक तकनीक को समाहित करता है, बल्कि औपनिवेशिक काल के पुराने और प्रासंगिकता खो चुके ढांचों को भी समाप्त करता है।

किसी भी कानून के छात्र, अधिवक्ता (Advocate), या न्यायिक सेवा परीक्षा (Judicial Service Exams जैसे RJS, HJS, UPPCS-J, MPJS) की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए नए कानून के प्रशासनिक और न्यायालयी ढांचे को समझना अनिवार्य है। जब हम आपराधिक प्रक्रिया की बात करते हैं, तो सबसे पहला सवाल यह उठता है कि “अपराध की सुनवाई कौन करेगा और वे न्यायालय कौन से हैं जिन्हें कानूनन यह शक्ति प्राप्त है?” इस प्रश्न का उत्तर हमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 6 में मिलता है। धारा 6 वह आधारशिला है जो भारत में आपराधिक न्यायालयों के वर्गों (Classes of Criminal Courts) को निर्धारित करती है। यह लेख इस धारा का एक ऐसा गहन विश्लेषण (In-depth Analysis) है, जिसके बाद आपको किसी अन्य संदर्भ सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: CrPC 1973 की धारा 6 से BNSS 2023 की धारा 6 का सफर

न्यायालयों के वर्गीकरण को समझने से पहले इसके इतिहास और विकास को समझना आवश्यक है। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 6 में भी आपराधिक न्यायालयों के वर्गों का उल्लेख था। लेकिन पुराने कानून और नए कानून में कुछ ऐसे बुनियादी और संरचनात्मक अंतर (Structural Differences) आए हैं, जिन्हें समझे बिना न्यायिक परीक्षाओं के प्रारंभिक (Prelims) और मुख्य (Mains) परीक्षा के प्रश्नों को हल करना असंभव है।

CrPC 1973 की धारा 6 का प्रारूप:

पुराने कानून के तहत, प्रत्येक राज्य में उच्च न्यायालय (High Court) के अलावा निम्नलिखित आपराधिक न्यायालय होते थे:

  1. सेशन्स न्यायालय (Court of Session)

  2. प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट और किसी महानगर क्षेत्र में, महानगर मजिस्ट्रेट (Metropolitan Magistrate)

  3. द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate of the Second Class)

  4. कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate)

BNSS 2023 की धारा 6 में क्या बदला? (The Big Paradigm Shift):

नए कानून का सबसे क्रांतिकारी बदलाव महानगर क्षेत्रों (Metropolitan Areas) और महानगर मजिस्ट्रेटों (Metropolitan Magistrates) की अवधारणा को पूरी तरह समाप्त करना है। पुराने कानून के तहत, जिस शहर की आबादी 10 लाख से अधिक होती थी, उसे राज्य सरकार द्वारा ‘महानगर क्षेत्र’ घोषित किया जाता था और वहाँ न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्थान पर महानगर मजिस्ट्रेट नियुक्त होते थे। BNSS ने इस दोहरे वर्गीकरण को समाप्त कर दिया है। अब पूरे राज्य में एक समान न्यायिक व्यवस्था होगी, जिससे प्रशासनिक जटिलताएं कम होंगी।

3. BNSS की धारा 6 का बेयर एक्ट पाठ (Bare Act Language of Section 6 BNSS)

एक विधि छात्र के लिए बेयर एक्ट की भाषा पर पकड़ होना सबसे जरूरी है। आइए पहले इसके शब्दशः प्रारूप को देखते हैं:

“धारा 6: आपराधिक न्यायालयों के वर्ग

उच्च न्यायालयों और इस संहिता से भिन्न किसी विधि के अधीन गठित न्यायालयों के अतिरिक्त, प्रत्येक राज्य में निम्नलिखित वर्गों के आपराधिक न्यायालय होंगे, अर्थात्:—

(i) सेशन्स न्यायालय;

(ii) प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट;

(iii) द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट; और

(iv) कार्यपालक मजिस्ट्रेट।”

बेयर एक्ट का विस्तृत विश्लेषण (Dissection of the Provision):

इस धारा की शुरुआत में दो अत्यंत महत्वपूर्ण अपवाद या समावेशन दिए गए हैं:

  1. उच्च न्यायालयों के अतिरिक्त (Besides High Courts): उच्च न्यायालय राज्य की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अंतर्निहित और अधीक्षण की शक्तियां प्राप्त हैं। साथ ही, BNSS के विभिन्न प्रावधानों के तहत उच्च न्यायालय स्वयं भी एक आपराधिक न्यायालय के रूप में कार्य कर सकता है।

  2. अन्य विधि के अधीन गठित न्यायालय (Courts constituted under any other law): भारत में कई विशेष कानून हैं जैसे एनडीपीएस एक्ट (NDPS Act), पोक्सो एक्ट (POCSO Act), एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act), और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (PC Act)। इन कानूनों के तहत ‘विशेष न्यायालयों’ (Special Courts) का गठन किया जाता है। धारा 6 स्पष्ट करती है कि यह वर्गीकरण उन विशेष न्यायालयों के अस्तित्व को प्रभावित नहीं करता है।

4. आपराधिक न्यायालयों का वर्गीकरण और उनकी संरचना (Detailed Classification & Structure)

आइए धारा 6 के तहत निर्दिष्ट चारों वर्गों का क्रमिक, गहन और विधिक विश्लेषण करते हैं।

                        प्रशासकीय एवं न्यायिक पदानुक्रम (Hierarchy)
                                      |
                                High Court (उच्च न्यायालय)
                                      |
                                Court of Session (सेशन्स न्यायालय)
                                      |
                      ---------------------------------
                      |                               |
        Judicial Magistrates (न्यायिक मजिस्ट्रेट)     Executive Magistrates (कार्यपालक मजिस्ट्रेट)
                      |                               |
        -----------------------------         -----------------------------
        |                           |         |                           |
    Chief Judicial Magistrate   Judicial    District Magistrate      Sub-Divisional 
    (मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट)  Magistrate  (जिला मजिस्ट्रेट - DM)   Magistrate (SDM)
                                1st & 2nd Class

5. वर्ग I: सेशन्स न्यायालय (Court of Session) – धारा 7, 8 और 9 के साथ सह-पठित

आपराधिक मामलों में जिला स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय ‘सेशन्स न्यायालय’ या ‘सत्र न्यायालय’ होता है। इसे दीवानी मामलों में ‘जिला न्यायालय’ कहा जाता है, परंतु जब यह आपराधिक मामलों की सुनवाई करता है, तो इसे ‘सेशन्स न्यायालय’ कहा जाता है।

गठन और नियुक्ति:

  • कौन करता है गठन?: BNSS की धारा 7 के अनुसार, राज्य सरकार प्रत्येक सेशन्स खंड (Sessions Division) के लिए एक सेशन्स न्यायालय स्थापित करेगी।

  • पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer): इस न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा की जाती है (धारा 9 BNSS)।

  • अपर और सहायक सेशन्स न्यायाधीश (Additional & Assistant Sessions Judges): कार्यभार को सुचारू रूप से चलाने के लिए उच्च न्यायालय अपर सेशन्स न्यायाधीशों की नियुक्ति भी कर सकता है।

शक्तियां और क्षेत्राधिकार (Powers under BNSS):

BNSS के तहत सेशन्स न्यायाधीश को व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं। वह कानून द्वारा अधिकृत कोई भी दंड दे सकता है, लेकिन यदि वह मृत्युदंड (Death Sentence) सुनाता है, तो उसे निष्पादित करने से पहले उच्च न्यायालय (High Court) से पुष्टि (Confirmation) कराना अनिवार्य है।

6. वर्ग II: प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate of the First Class)

यह आपराधिक प्रशासन की रीढ़ की हड्डी है। देश के अधिकांश आपराधिक मामलों की शुरुआत और प्रारंभिक सुनवाई इन्हीं न्यायालयों में होती है।

संरचना और नियंत्रण:

  • प्रत्येक जिले में (जो सेशन्स खंड नहीं है), राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद, जितनी संख्या में चाहे उतने प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों की स्थापना कर सकती है।

  • इनके ऊपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate – CJM) होता है, जो जिले के सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों के कार्यों का समन्वय और वितरण करता है।

दंड देने की शक्ति:

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग की दंड देने की शक्तियों को भी नए कानूनों के आलोक में समझना होगा। वे गंभीर प्रकृति के अपराधों, जैसे चोरी, धोखाधड़ी, और चोट पहुँचाने के मामलों की सुनवाई करते हैं।

7. वर्ग III: द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate of the Second Class)

यह न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पदानुक्रम में सबसे निचला स्तर है।

भूमिका और महत्व:

  • इनकी स्थापना भी राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।

  • व्यावहारिक रूप से, कई राज्यों में न्यायिक सेवा परीक्षा (PCS-J) पास करने वाले नए सिविल जजों को शुरुआत में द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी जाती हैं, ताकि वे छोटे और कम गंभीर आपराधिक मामलों (जैसे साधारण मारपीट, छोटे जुर्माने वाले अपराध) की प्रक्रिया सीख सकें।

  • मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के पास यह शक्ति होती है कि वह किसी भी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य करने के लिए अधिकृत कर सके, बशर्ते उच्च न्यायालय की अनुमति हो।

8. वर्ग IV: कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate)

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्गीकरण है जो न्यायपालिका (Judiciary) और कार्यपालिका (Executive) के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 50 (Directive Principles of State Policy) के तहत न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का निर्देश है। धारा 6(iv) इसी संतुलन को बनाए रखती है।

कार्यपालक मजिस्ट्रेट कौन होते हैं?:

इनकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है, न कि उच्च न्यायालय द्वारा। ये भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) या राज्य सिविल सेवा (State PCS) के अधिकारी होते हैं।

  • जिला मजिस्ट्रेट (District Magistrate – DM)

  • अपर जिला मजिस्ट्रेट (Additional District Magistrate – ADM)

  • उप-खंड मजिस्ट्रेट (Sub-Divisional Magistrate – SDM)

इनका मुख्य कार्य क्या है?:

न्यायिक मजिस्ट्रेटों का कार्य अपराधियों को दंडित करना और मुकदमों का विचारण (Trial) करना होता है। इसके विपरीत, कार्यपालक मजिस्ट्रेटों का प्राथमिक कार्य “अमन-चैन बनाए रखना, शांति व्यवस्था (Law and Order) कायम रखना और अपराधों को रोकना (Prevention of Crimes)” है।

महत्वपूर्ण संदर्भ (Live Case Study Connection): भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 194 (जो पुरानी CrPC की धारा 174 के समतुल्य है) के तहत, जब भी किसी संदिग्ध परिस्थिति या दुर्घटना में मृत्यु (Suicide or Accidental Death) होती है, तो पुलिस उसकी ‘मर्ग रिपोर्ट’ तैयार करती है। इस मर्ग जांच की अंतिम रिपोर्ट और उस पर आदेश पारित करने की विधिक शक्ति कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SDM) के पास होती है। यदि SDM अपने आदेश में यह प्रमाणित कर देता है कि मृत्यु केवल एक दुर्घटना थी और इसमें कोई आपराधिक इरादा नहीं था, तो यह एक अकाट्य सार्वजनिक दस्तावेज (Conclusive Public Document) बन जाता है, जिसका उपयोग बीमा क्लेम (Insurance Claims) जैसे मामलों में सिविल या उपभोक्ता अदालतों में अकाट्य साक्ष्य के रूप में किया जाता है।

9. तुलनात्मक तालिका: CrPC 1973 की धारा 6 बनाम BNSS 2023 की धारा 6

लॉ स्टूडेंट्स और जुडिशल एस्पिरेंट्स के लिए इस बदलाव को एक नजर में समझना बहुत जरूरी है:

तुलना का बिंदु (Basis of Comparison) दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023
धारा संख्या (Section Number) धारा 6 धारा 6
महानगर क्षेत्र (Metropolitan Areas) अस्तित्व था (10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर) पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
महानगर मजिस्ट्रेट (Metropolitan Magistrate) शहरों में विशिष्ट नियुक्ति होती थी। इस पद को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
न्यायालयों की श्रेणियाँ

1. सेशन्स कोर्ट

 

2. प्रथम वर्ग/महानगर मजिस्ट्रेट

 

3. द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट

 

4. कार्यपालक मजिस्ट्रेट

1. सेशन्स कोर्ट

 

2. प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट

 

3. द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट

 

4. कार्यपालक मजिस्ट्रेट

एकरूपता (Uniformity) ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग व्यवस्था थी। पूरे राज्य और देश में समान (Uniform) व्यवस्था लागू है।

10. न्यायिक मजिस्ट्रेटों और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों में अंतर (Judicial vs Executive Magistrates)

मुख्य परीक्षाओं (Mains Exams) में यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है। इसे बिंदुवार समझना आवश्यक है:

1. नियुक्ति का प्राधिकारी (Appointing Authority):

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट: इनकी नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण सीधे उच्च न्यायालय (High Court) और संबंधित जिले के सेशन्स जज के अधीन होता है।

  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट: इनकी नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकार (State Government) के अधीन होता है।

2. मुख्य कार्य (Core Function):

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट: इनका कार्य न्यायिक (Judicial) होता है। ये साक्ष्यों की विवेचना करते हैं, गवाहों के बयान दर्ज करते हैं, मुकदमों का विचारण (Trial) करते हैं और दोषी को कारावास या जुर्माने की सजा सुनाते हैं।

  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट: इनका कार्य प्रशासनिक और निवारक (Administrative and Preventive) होता है। ये शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा 163 BNSS (पुरानी धारा 144 CrPC) के तहत निषेधाज्ञा जारी करते हैं, मर्ग जांच (Inquest) करते हैं, और प्रशासनिक कुंठाओं को दूर करते हैं।

3. जवाबदेही (Accountability):

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं, जो कानून के शासन (Rule of Law) को अक्षुण्ण रखता है।

  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट सरकार के प्रति जवाबदेह हैं, जो नीतियों के क्रियान्वयन और कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हैं।

11. न्यायिक सेवा परीक्षाओं (Judicial Services) के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण प्रश्न (Exam-Oriented Questions)

यदि आप न्यायिक परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, तो धारा 6 से निम्नलिखित प्रकार के प्रश्न बन सकते हैं:

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims Objective Questions):

  1. BNSS की धारा 6 के तहत निम्नलिखित में से कौन सा आपराधिक न्यायालयों का वर्ग नहीं है?

    • (A) सेशन्स न्यायालय

    • (B) महानगरीय मजिस्ट्रेट न्यायालय

    • (C) द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट

    • (D) कार्यपालक मजिस्ट्रेट

    • उत्तर: (B) – क्योंकि BNSS में महानगर मजिस्ट्रेट का पद समाप्त हो चुका है।

  2. आपराधिक न्यायालयों के वर्गीकरण में उच्च न्यायालय के अलावा किसे शामिल किया गया है?

    • (A) केवल सेशन्स कोर्ट

    • (B) किसी अन्य विधि के अधीन गठित विशेष न्यायालय

    • (C) ट्रिब्यूनल

    • (D) उपरोक्त सभी

    • उत्तर: (B)

8.1 कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की विशेष शक्तियां और व्यावहारिक भूमिका (Special Powers and Practical Role of Executive Magistrates)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए व्यापक निवारक (Preventive) शक्तियां दी गई हैं। एक कानून के छात्र के लिए इन व्यावहारिक प्रावधानों को समझना बेहद जरूरी है:

A. अशांति और दंगे रोकना: धारा 163 BNSS (पुरानी CrPC की धारा 144)

जब भी किसी क्षेत्र में मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा होता है, या दंगे (Riots) भड़कने की आशंका होती है, तो जिला मजिस्ट्रेट (DM) या उप-खंड मजिस्ट्रेट (SDM) इस धारा के तहत निषेधाज्ञा जारी करते हैं।

  • इसके तहत 4 या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने, हथियार ले जाने या इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद करने के आदेश दिए जाते हैं।

  • यह पूरी तरह से एक प्रशासनिक और निवारक शक्ति है, जिसका उद्देश्य अपराध को होने से पहले ही रोकना है।

B. शांति और सदाचार के लिए प्रतिभूति (Security for Keeping the Peace and Good Behaviour): धारा 125 से 128 BNSS

यदि कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति समाज में शांति भंग कर सकता है, या वह कोई आदतन अपराधी (Habitual Offender) है, तो वे उस व्यक्ति को एक निश्चित अवधि (जैसे 1 वर्ष या 3 वर्ष) के लिए शांति बनाए रखने का ‘बॉन्ड’ (Bond) भरने का आदेश दे सकते हैं। यदि वह व्यक्ति बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसे हिरासत में भी लिया जा सकता है।

C. मर्ग जांच (Inquest Proceedings) में विधिक शक्ति: धारा 194 BNSS (पुरानी CrPC की धारा 174)

जैसा कि हमने पहले चर्चा की, संदिग्ध मौतों के मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेट की भूमिका प्राथमिक होती है। कानूनन, पुलिस ऐसी किसी भी अप्राकृतिक मृत्यु की सूचना तुरंत निकटतम कार्यपालक मजिस्ट्रेट को देती है।

इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू बीमा दावों (Insurance Claims) में देखने को मिलता है। जब किसी व्यक्ति की दुर्घटना या संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है, तो बीमा कंपनियां (Insurance Companies) क्लेम पास करने से पहले विधिक रूप से प्रमाणित मर्ग रिपोर्ट की मांग करती हैं। कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SDM) द्वारा हस्ताक्षरित और स्वीकृत यह रिपोर्ट दीवानी और उपभोक्ता अदालतों में एक अकाट्य सार्वजनिक दस्तावेज (Conclusive Public Document) मानी जाती है, जो यह साबित करती है कि मौत में कोई अन्य आपराधिक संलिप्तता नहीं थी। इसके बिना कानूनी रूप से वारिसों के लिए क्लेम हासिल करना अत्यंत जटिल हो जाता है।

8.2 आपराधिक न्यायालयों का प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction of Criminal Courts) – धारा 7 और 8 के विशेष संदर्भ में

केवल न्यायालयों के वर्गों को जानना पर्याप्त नहीं है; वे न्यायालय किस भौगोलिक सीमा (Geographical Boundary) के भीतर काम करेंगे, यह जानना भी अनिवार्य है। इसके लिए हमें धारा 6 को धारा 7 (प्रादेशिक खंड – Territorial Divisions) और धारा 8 (महानगर क्षेत्र की समाप्ति का प्रभाव) के साथ जोड़कर देखना होगा।

1. सेशन्स खंड और जिले (Sessions Divisions and Districts):

  • BNSS की धारा 7 के अनुसार, प्रत्येक राज्य एक सेशन्स खंड होगा या उसमें सेशन्स खंड होंगे।

  • प्रत्येक सेशन्स खंड में एक या अधिक जिले हो सकते हैं।

  • क्षेत्राधिकार का निर्धारण: राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के परामर्श से, इन खंडों और जिलों की सीमाओं या उनकी संख्या में बदलाव (Alteration) कर सकती है। इसका सीधा अर्थ यह है कि एक सेशन्स जज का न्यायिक अधिकार उसी खंड की सीमाओं तक सीमित होता है।

2. नए कानून में क्षेत्राधिकार का सरलीकरण:

पुरानी CrPC के तहत, प्रादेशिक क्षेत्राधिकार तय करते समय राज्य सरकार को ‘महानगर क्षेत्रों’ के लिए अलग से अधिसूचना जारी करनी पड़ती थी। चूंकि BNSS की धारा 6 और 8 ने महानगरों के इस विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया है, इसलिए अब पूरे राज्य में प्रादेशिक क्षेत्राधिकार तय करने का फॉर्मूला बेहद सरल और एकसमान हो गया है। अब केवल ‘सेशन्स खंड’ और ‘जिले’ ही प्रादेशिक इकाई होंगे, चाहे वह मुंबई जैसे महानगर हों या कोई सुदूर ग्रामीण जिला।

12. निष्कर्ष (Conclusion)

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 6 केवल न्यायालयों की एक सूची नहीं है, बल्कि यह भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली का वह कंकाल (Skeleton) है जिसके ऊपर पूरी प्रक्रिया टिकी हुई है। महानगर क्षेत्रों के कृत्रिम वर्गीकरण को समाप्त करके विधायिका ने विधिक एकरूपता (Legal Uniformity) की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम उठाया है।

Leave A Reply

Navigate