पैतृक संपत्ति वह संपत्ति है जो पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से विरासत में मिलती है। इसमें जन्म लेते ही बच्चे का कानूनी अधिकार बन जाता है।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के तहत बेटियों को बेटों के बराबर जन्मसिद्ध कोपार्शनर अधिकार।
- पिता या दादा अकेले पैतृक संपत्ति को बिना सभी वारिसों की सहमति के बेच नहीं सकते।
- आपसी सहमति से परिवारिक समझौता विलेख (Family Settlement Deed) द्वारा बंटवारा सबसे सुगम।
- विवाद होने पर सिविल कोर्ट में बंटवारे का वाद (Partition Suit) दाखिल करना होता है।
1. बंटवारा करने के दो कानूनी तरीके
1. आपसी सहमति से पारिवारिक बंटवारा
सभी वारिस बैठकर नक्शा और हिस्से तय करते हैं और इसे सब-रजिस्ट्रार के यहां पंजीकृत कराकर नामांतरण दर्ज कराते हैं।
2. अदालत द्वारा कानूनी बंटवारा (Partition Suit)
यदि कोई एक हिस्सेदार भी बंटवारे से इनकार करे, तो सिविल कोर्ट कोर्ट कमिश्नर नियुक्त कर प्रत्येक हिस्सेदार का हिस्सा अलग करती है।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: क्या शादीशुदा बेटी का भी पैतृक संपत्ति में हिस्सा होता है?
A: हां, सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा फैसले के अनुसार बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसका बेटे के समान पूर्ण अधिकार है।
Q: पिता की खुद कमाई संपत्ति (Self-Acquired) में क्या बच्चों का हक है?
A: नहीं, पिता अपनी स्वअर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से किसी को भी वसीयत या दान कर सकता है, इसमें संतान जबरन हिस्सा नहीं मांग सकती।