देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश के संभल से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका के तहत की गई प्रशासनिक हिरासत को निरस्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत कानून का इस्तेमाल राज्य प्राधिकारियों द्वारा सामान्य कानून-व्यवस्था के मामलों में अंधाधुंध तरीके से नहीं किया जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर
अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में रेखांकित किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। किसी भी नागरिक को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने से पहले राज्य को यह साबित करना होगा कि सामान्य आपराधिक कानून उस स्थिति से निपटने में पूरी तरह असमर्थ थे।
फैसले के प्रमुख कानूनी बिंदु
- निवारक निरोध कोई दंडात्मक उपाय नहीं है, बल्कि असाधारण परिस्थितियों का अपवाद है।
- जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए हिरासत आदेश में पर्याप्त और प्रासंगिक सामग्री का अभाव था।
- हिरासत में रखे गए व्यक्ति को अपना प्रतिवेदन देने के उचित अवसर से वंचित करना प्रक्रियात्मक अवैधता है।
- कोर्ट ने संबंधित नागरिक को तुरंत रिहा करने का आदेश जारी किया।