जब किसी व्यक्ति को यह अंदेशा हो कि उसके खिलाफ किसी गैर-जमानती अपराध में झूठी या दुर्भावनापूर्ण एफआईआर दर्ज हो सकती है, तो वह गिरफ्तारी से पहले ही अदालत से अग्रिम जमानत ले सकता है।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- धारा 482 BNSS (पुरानी 438 CrPC) के तहत सेशन कोर्ट या सीधे हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी।
- अग्रिम जमानत मिलने पर पुलिस उस मामले में आरोपी को हथकड़ी नहीं लगा सकती और न ही लॉकअप में डाल सकती है।
- जमानत देते समय कोर्ट पासपोर्ट जमा करने और जांच में सहयोग करने जैसी शर्तें लगा सकती है।
- पॉक्सो (POCSO) और एससी/एसटी एक्ट के कुछ विशेष मामलों में अग्रिम जमानत पर वैधानिक प्रतिबंध होते हैं।
1. अग्रिम जमानत के 3 मुख्य चरण
1. सेशन कोर्ट में अर्जी
वकील के जरिए एफआईआर कॉपी या शिकायत की प्रति और बेगुनाही के सबूतों के साथ जिला व सत्र न्यायालय में याचिका लगाएं।
2. अंतरिम संरक्षण (Interim Stay)
कोर्ट पहली ही सुनवाई में पुलिस से केस डायरी मांगते हुए अगली तारीख तक गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा सकती है।
3. हाईकोर्ट में अपील
यदि सेशन कोर्ट से जमानत खारिज हो जाए, तो उसी दिन हाईकोर्ट में धारा 482 BNSS के तहत नई अर्जी दाखिल करें।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: क्या एफआईआर दर्ज होने से पहले भी अग्रिम जमानत मिल सकती है?
A: हां, यदि गिरफ्तारी की वास्तविक और ठोस आशंका साबित कर दी जाए तो एफआईआर दर्ज होने से पहले भी अग्रिम जमानत मंजूर हो सकती है।
Q: अग्रिम जमानत की वैधता कब तक रहती है?
A: सुप्रीम कोर्ट के 'सुशीला अग्रवाल' फैसले के अनुसार सामान्यतः अग्रिम जमानत ट्रायल (मुकदमा) समाप्त होने तक जारी रहती है।