वैवाहिक कलह में सबसे ज्यादा आघात मासूम बच्चों पर पड़ता है। कस्टडी का फैसला करते समय अदालत माता या पिता के अहंकार को नहीं, बल्कि केवल बच्चे के सर्वोत्तम हित को देखती है।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां को ही दी जाती है (हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट धारा 6)।
- अदालत के लिए सबसे सर्वोपरि सिद्धांत 'बच्चे का कल्याण' (Welfare of the Child) होता है।
- जिस पक्ष को कस्टडी नहीं मिलती, उसे बच्चे से मिलने का नियमित अधिकार (Visitation Rights) मिलता है।
- 9 वर्ष या उससे अधिक उम्र के समझदार बच्चे की निजी इच्छा को भी जज चैंबर में बुलाकर सुनते हैं।
1. कस्टडी तय करते समय कोर्ट क्या देखती है?
1. भावनात्मक जुड़ाव
बच्चा किसके साथ अधिक सुरक्षित, खुश और मानसिक रूप से शांत महसूस करता है।
2. शिक्षा व परवरिश का माहौल
बच्चे के अच्छे स्कूल, रहने की साफ-सुथरी जगह और पारिवारिक सहयोग की उपलब्धता।
3. चरित्र व आचरण
शराब की लत, अनैतिक आचरण या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले पक्ष को कस्टडी नहीं दी जाती।
4. वित्तीय क्षमता
केवल अमीर होना कस्टडी की गारंटी नहीं है; गरीब मां को बच्चे के पालन के लिए पिता से खर्चा दिलाया जाता है।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: क्या पिता को कभी छोटे बच्चे की कस्टडी मिल सकती है?
A: हां, यदि यह साबित हो जाए कि मां मानसिक रूप से अस्वस्थ है, बच्चे की उपेक्षा करती है या बच्चे की जान को खतरा है।
Q: विजिटेशन राइट्स (Visitation Rights) क्या होते हैं?
A: हफ्ते में एक बार, छुट्टियों में या जन्मदिन पर दूसरे अभिभावक को बच्चे से मिलने और वीडियो कॉल करने का अदालती अधिकार।