भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 (पुरानी 125 CrPC) पीड़ित पत्नी, नाबालिग बच्चों और असहाय बुजुर्ग माता-पिता को भुखमरी और बेसहारा होने से बचाने का एक सामाजिक कानून है।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- पति की आर्थिक हैसियत और जीवन स्तर के अनुसार अदालत अंतरिम और अंतिम भरण-पोषण तय करती है।
- सुप्रीम कोर्ट के 'रजनेश बनाम नेहा' फैसले के अनुसार दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और आय का विस्तृत शपथ पत्र (Affidavit of Assets) देना अनिवार्य।
- केस दाखिल होने के 60 दिनों के भीतर अंतरिम मेंटेनेंस (Interim Maintenance) का फैसला करने का नियम।
- बुजुर्ग माता-पिता भी अपने सक्षम बेटे या बेटी से भरण-पोषण का कानूनी दावा कर सकते हैं।
1. भरण-पोषण तय करते समय कोर्ट क्या देखती है?
- पति की वास्तविक आय, व्यापार, बैंक बैलेंस और अचल संपत्ति
- पत्नी की अपनी आय और क्या वह कमाने में सक्षम है
- बच्चों की स्कूल फीस, ट्यूशन, स्वास्थ्य और रहने का खर्च
- पति के ऊपर अन्य आश्रितों (वृद्ध माता-पिता) की जिम्मेदारी
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जमीन विवाद, नामांतरण (दाखिल-खारिज), अवैध कब्जा, पुलिस शिकायत, एफआईआर, चेक बाउंस, बैंक खाता फ्रीज या कोर्ट केस में एडवोकेट संजय यादव से सही कानूनी मार्गदर्शन और सटीक समाधान प्राप्त करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: भरण-पोषण न देने पर क्या जेल हो सकती है?
A: हां, अदालत के आदेश के बाद भी गुजारा भत्ता न चुकाने पर रिकवरी वारंट जारी होता है और प्रत्येक डिफ़ॉल्ट महीने के लिए जेल की सजा हो सकती है।
Q: क्या काम करने वाली (Working) पत्नी को भी मेंटेनेंस मिल सकता है?
A: यदि पत्नी की आय पति के जीवन स्तर की तुलना में कम है, तो कोर्ट जीवन स्तर की समानता बनाए रखने के लिए अंतर राशि का भरण-पोषण दिला सकती है।