सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों के अनुसार दो बालिग व्यक्तियों का आपसी सहमति से बिना विवाह एक साथ रहना (Live-in Relationship) कोई अपराध या गैर-कानूनी कृत्य नहीं है।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- लंबे समय तक साथ रहने पर कानून इसे विवाह के समतुल्य (Presumption of Marriage) मानता है।
- महिला पार्टनर को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत संरक्षण और धारा 144 BNSS में भरण-पोषण का पूर्ण अधिकार।
- लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों को 100% वैध (Legitimate) माना जाता है और उन्हें माता-पिता की संपत्ति में पूरा हक मिलता है।
- परिवार या समाज से जान का खतरा होने पर हाईकोर्ट से तत्काल पुलिस सुरक्षा (Protection Petition) प्राप्त की जा सकती है।
1. सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 4 लिव-इन मानदंड
- दोनों का बालिग होना (पुरुष 21+, महिला 18+) और सहमति से संबंध में रहना
- पति-पत्नी की तरह एक ही छत के नीचे लंबे समय तक रहना
- समाज में स्वयं को एक युगल (Couple) के रूप में प्रस्तुत करना
- पहले से किसी अन्य व्यक्ति से वैध विवाह का जीवित न होना
किसी भी कानूनी, दस्तावेजी या जमीनी समस्या के लिए विशेषज्ञ विधिक राय लें
जमीन विवाद, नामांतरण (दाखिल-खारिज), अवैध कब्जा, पुलिस शिकायत, एफआईआर, चेक बाउंस, बैंक खाता फ्रीज या कोर्ट केस में एडवोकेट संजय यादव से सही कानूनी मार्गदर्शन और सटीक समाधान प्राप्त करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: क्या लिव-इन में ब्रेकअप होने पर महिला मेंटेनेंस मांग सकती है?
A: हां, यदि वे लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे हैं, तो महिला धारा 144 BNSS के तहत भरण-पोषण पाने की हकदार है।
Q: क्या कुछ राज्यों में लिव-इन का पंजीकरण अनिवार्य है?
A: उत्तराखंड के समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे कुछ नए कानूनों में लिव-इन का 1 महीने में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है।