गिरफ्तारी के बाद आरोपी को पुलिस हिरासत में रखा जाएगा या जेल भेजा जाएगा, इसका फैसला केवल अदालत करती है। दोनों कस्टडी के नियम और अधिकार पूरी तरह अलग हैं।
📌 मुख्य बिंदु व विशेषताएं (Key Highlights)
- संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य।
- पुलिस कस्टडी (Police Remand) में आरोपी थाने के लॉकअप में रहता है और पुलिस उससे पूछताछ करती है।
- ज्यूडिशियल कस्टडी (Judicial Remand) में आरोपी सीधे जेल अधीक्षक की देखरेख में जेल में रहता है।
- हर 48 घंटे में आरोपी का सरकारी डॉक्टर से मेडिकल परीक्षण कराना अनिवार्य है (डी.के. बसु गाइडलाइंस)।
1. पुलिस और न्यायिक हिरासत का तुलनात्मक चार्ट
| मापदंड | पुलिस कस्टडी (Police Custody) | ज्यूडिशियल कस्टडी (Judicial Custody) |
|---|---|---|
| स्थान | थाने का लॉकअप / पुलिस पूछताछ रूम | केंद्रीय या जिला कारागार (Jail) |
| पूछताछ का अधिकार | पुलिस सीधे पूछताछ कर सकती है | पुलिस बिना कोर्ट की पूर्व अनुमति के जेल में पूछताछ नहीं कर सकती |
| सुरक्षा | थर्ड डिग्री या दबाव का खतरा रहता है | जेल नियमों और कोर्ट के सीधे संरक्षण में रहता है |
| अधिकतम अवधि | नए कानून में शुरुआती 40-60 दिनों के भीतर कुल 15 दिन | चार्जशीट तक (60 या 90 दिन) या जमानत मिलने तक |
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q: यदि पुलिस 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में बैठाए रखे तो?
A: यह अवैध हिरासत (Illegal Confinement) है। वकील तुरंत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका लगा सकता है।
Q: क्या पुलिस कस्टडी में वकील मिल सकता है?
A: हां, धारा 38 BNSS के अनुसार पूछताछ के दौरान आरोपी को अपने वकील से मिलने और दूर से देखने का पूर्ण अधिकार है।